अलीगढ़ 20 अप्रैल। जैसे जैसे अलीगढ़ के लोकसभा चुनाव की तारिख नजदीक आ रही है वैसे वैसे अलीगढ़ की जनता के बीच एक सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है, कि 2024 का ताज किसके सर बंधेगा ? अलीगढ़ लोकसभा पर लम्बे समय तक कांग्रेस का कब्जा रहा है। इंदिरा गांधी के शासन काल के दौरान ऊषारानी तौमर तथा उसके बाद वर्ष 2004 में कांग्रेस प्रत्याशी चौधरी बिजेन्द्र सिंह को जीत हासिल हुयी थी।
अलीगढ़ लोकसभा सीट पर आजादी के बाद कांग्रेस तथा तत्कालीन विपक्षी पार्टियों का मिला जुला असर रहा है। अगर लगातार जीतने बाले सांसदों की बात करें तो वर्ष 1991 से लेकर 2004 तक की अवधि में शीला गौतम तथा उसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी चौधरी बिजेन्द्र सिंह सांसद चुने गये। 2009 में बसपा से राजकुमारी चौहान सांसद चुनी गयी, वर्ष 2014 में तथा 2019 में भाजपा के सतीश गौतम दो बार सांसद चुने गये। वर्ष 2024 के इस चुनाव में मुख्य रूप से वर्तमान सांसद सतीश गौतम का मुकाबला इंडिया गठबंधन प्रत्याशी चौधरी बिजेन्द्र सिंह के साथ ही है। हालांकि बसपा प्रत्याशी पं0 हितेन्द्र उपाध्याय उर्फ बंटी भी ब्राह्मण एवं दलित वोटों के साथ मजबूत चुनौती दे रहे हैं।
अभी तक क्षत्रिय मतदाताओं के विरोध के कारण चुनावी तस्वीर साफ नहीं हो सकी है वहीं दूसरी ओर जाट मतदाताओं के अपने सजातीय उम्मीदवार के प्रति सहानुभूति के कारण चौधरी बिजेन्द्र सिंह मुस्लिम-जाट-यादव व बघेल मतदाताओं के दम पर चुनाव में मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा से राजपूत मतदाताओं की नाराजगी एवं अलग चुनौती पेश कर रही है। भाजपा सांसद के व्यक्तिगत व्यवहार से नाराज होने के कारण मतदाता व कार्यकर्ता नाराज नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों गाजियाबाद सीट से जनरल बी0के0 सिंह की टिकिट काटने से नाराज क्षत्रियों ने पंचायतें करके, भाजपा के खिलाफ बिगुल फूंका उसके सोशल मीडिया पर जमकर प्रचार हुआ। फिर सहारपुर से एक अलग मुहिम लगातार मुहिम जारी है।
वर्ष 2017 के विगत दिनों मेयर चुनाव में प्रत्याशी राजीव अग्रवाल को मिली शिकस्त के पीछे भी पार्टी के कुछ जयचंदों का ही हाथ था। जिस तरह 2023 के मेयर चुनाव में सांसद खेमे द्वारा अपने चहेते प्रत्याशी प्रशान्त अग्रवाल को टिकिट दिलाकर जीत दिलायी गयी, उसके बाद एक अलग विरोधी अंसतुष्ट खेमा भी महानगर में तैयार हो गया। अब सांसद की टिकिट के आधा दर्जन दावेदार भी हताशा और निराशा में पर्दे के पीछे रहकर भाजपा प्रत्याशी को शिकस्त देने की फिराक में है। गौरतलब है कि जनपद अलीगढ़ में भाजपा के तीन खेमे हैं जो कि प्रभावी भूमिका में हैं। सांसद खेमे को शिकस्त देने के लिये दो विरोधी एक हो गये हैं। इसके अतिरिक्त पिछले दिनों शहर सीट से विधायक मुक्ता राजा के साथ एक वायरल वीडियों को लेकर वैश्य वर्ग नाराज है।
इस चुनाव में महत्वपूर्ण बात यह है कि हर कोई पार्टी के साथ दिखने का प्रयास कर रहा है। लेकिन अकेले में व्यक्तिगत रूप से पार्टी के प्रत्याशी से नाराजगी भी जाहिर कर रहा है। पिछले दिनों कई जातिगत, सामाजिक कार्यक्रमों में भी भाजपा प्रत्याशी को कहीं नहीं देखा गया पर समाज के जिम्मेदार लोगों का कहना है कि वार्ष्णेय समाज के कार्यक्रमों में बसपा प्रत्याशी हितेन्द्र उपाध्याय जरूर पहुंचे, लेकिन भाजपा प्रत्याशी बुलाने के बावजूद भी नहीं पहुंचे। अब तस्वीर यह है कि भाजपा के ठोस वोट ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, लोधी वोटों में बिखराव नजर आ रहा है जिसके कारण भाजपा को सीट जीतना चुनौती बनी हुयी है। वहीं दूसरी ओर इंडिया गठबंधन प्रत्याशी को विरोध का वोट एक मुश्त होकर अधिकांश प्रतिशत मतदान करेगा। अब भाजपाईयों को अंधेरे में केवल एक उम्मीद की किरन नजर आ रही है वह एक उम्मीद है केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अलीगढ़ रैली लेकिन पार्टी विचारधारा को समर्पित वोटर भी व्यक्तिगत नाराजगी के कारण किसी भी बात को मानने को तैयार नहीं है।
इस बार 1984, 2004 की कांग्रेसी जीत को दोहराने के लिये बीस वर्ष के अंतराल के बाद पुनः कांग्रेस समर्पित प्रत्याशी चौधरी बिजेन्द्र सिंह ही टक्कर में नजर आ रहे हैं कुछ मिलाकर अलीगढ़ का लोकसभा चुनाव रोचक दौर में पहुंच चुका है अब देखना यह होगा कि चुनावी बारात में खुश होकर नाच गाना कर रहे घराती-बाराती किस तरह दूल्हे की बारात निकालते हैं |

यह बात इससे भी मजबूत होती है पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गभाना में सभा तथा प्रदेश अध्यक्ष की गांव विसारा में आयोजित सभा में भीड़ का नदारत रहना इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि पार्टी के लोग चुनाव को लेकर कितने समर्पित और गम्भीर है।
वहीं भाजपा के राजनीतिक पंडितों का कहना है कि फसल का समय होने के कारण भीड़ नहीं जुट पायी थी।






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1 thought on “क्या बीस वर्ष बाद अलीगढ़ की राजनीति दोहरायेगी इतिहास ?”
बहुत अच्छा और विवेचनात्मक आकलन किया है वैसे संसदीय क्षेत्र में व्यक्तिगत रूप को कहां महत्व मिलता है लेकिन यहां पिछले 10 वर्षों में जो एक खाई पैदा हुई उसका शायद परिणाम वह न निकले जिसे चुनावी पंडित घोषित कर रहे हैं