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क्या है यूजीसी के इक्विटी नियम? जिसका कैंपस से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा विरोध

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भोर की आवाज़, नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ को लेकर देशभर में तीखी बहस छिड़ गई है। जनरल कैटेगरी के छात्रों ने इसे “एक और SC/ST एक्ट” करार देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जबरदस्त विरोध शुरू कर दिया है।

सोशल मीडिया पर विरोध की बाढ़

#UGCBiasRules, #CampusFear और #AnotherSCSTAct जैसे हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं।  छात्र समूहों ने #UGCRollback के साथ इन नियमों में संशोधन और स्पष्ट सुरक्षा उपायों की मांग की है।

X (पूर्व में Twitter) पर एक पोस्ट में लिखा गया, “जंगलों से नक्सलियों के समाप्त होने की खुशी मनाना छोड़ दीजिए। यूजीसी की इक्विटी कमेटियां हर यूनिवर्सिटी कैंपस में अर्बन नक्सलियों का सरकारी रिहेबलिटेशन प्रोग्राम है। एबीवीपी कार्यकर्ता भी जाग जाएं। या तो आपको राष्ट्रवाद की राजनीति छोड़कर इक्विटी स्कवाॅडस् का हिस्सा बनकर जातिवाद की राजनीति करनी पड़ेगी या ये वोक स्कवाॅडस् और कमेटियां कैंपसों से आपको साफ कर देंगी। आपका प्रोफेशनल और राजनीतिक कैरियर दोनों समाप्त हो जाएगा।”

एक अन्य पोस्ट में कहा गया, “UGC की इक्विटी स्क्वाड का उपयोग व्यक्तिगत रंजिशों को निपटाने या करियर को खतरे में डालने के लिए किया जाएगा, जो कैंपस में भय की संस्कृति को बढ़ावा देगा।”

Change.org पर एक याचिका भी शुरू की गई है जिसमें इन नियमों को तत्काल वापस लेने की मांग की गई है।

क्या है नया नियम?

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को गजट में प्रकाशित इन नियमों के माध्यम से देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए एक बाध्यकारी ढांचा तैयार किया है, जो 2012 के भेदभाव-रोधी नियमों की जगह लेता है।  ये नियम रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार किए गए हैं।

हर संस्थान में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) और इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है। इक्विटी कमेटी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, विकलांग व्यक्तियों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।

‘इक्विटी स्क्वाड’ की तैनाती

संस्थानों को ‘इक्विटी स्क्वाड’—मोबाइल यूनिट बनाने होंगे जो कैंपस में संवेदनशील स्थानों पर गश्त करेंगे ताकि भेदभाव को रोका जा सके।  24 घंटे हेल्पलाइन भी स्थापित करनी होगी।

सभी छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ को प्रवेश/नियुक्ति के समय घोषणापत्र देना होगा कि वे समानता को बढ़ावा देंगे और भेदभाव में शामिल नहीं होंगे।

सख्त समय सीमा और कार्रवाई

शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर इक्विटी कमेटी की बैठक होनी चाहिए और 15 कार्य दिवसों के भीतर संस्थान के प्रमुख को रिपोर्ट सौंपनी होगी।  इसके बाद संस्थान के प्रमुख को सात कार्य दिवसों में कार्रवाई शुरू करनी होगी।

नियमों का पालन न करने पर संस्थानों को यूजीसी योजनाओं से बाहर किया जा सकता है, डिग्री और ऑनलाइन कार्यक्रमों पर रोक लग सकती है, और यूजीसी एक्ट की धारा 2(f) और 12B के तहत मान्यता भी रद्द की जा सकती है।

विरोध के मुख्य कारण

1. झूठी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं: ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायतों के लिए दंड या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था, लेकिन अंतिम अधिसूचित संस्करण में इस खंड को पूरी तरह हटा दिया गया है।

छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाया है कि जवाबदेही तंत्र को क्यों हटाया गया। उनकी चेतावनी है कि सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को बढ़ावा दे सकती है।

2. एकतरफा समिति संरचना: नियम स्पष्ट रूप से केवल SC, ST, OBC और EWS समूहों के खिलाफ भेदभाव को मान्यता देते हैं, जिससे जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों को इन नियमों के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है।

3. ‘भेदभाव’ की अस्पष्ट परिभाषा: भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट के साथ-साथ अंतर्निहित कृत्य भी शामिल हैं, जो इस शब्द को व्यक्तिपरक और खुला बनाता है। आलोचकों का कहना है कि स्पष्ट साक्ष्य मानकों के बिना इरादे का अनुमान लगाया जा सकता है।

4. निगरानी संस्कृति: यह ढांचा गति, धारणा और अनुपालन को प्राथमिकता देता है, लेकिन सुरक्षा उपायों, स्पष्टता और उचित प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कमियां छोड़ देता है।

विशेषज्ञों की चिंताएं

जनरल कैटेगरी के छात्रों और संकाय के लिए सुरक्षा से वंचित करके, यूजीसी ने एक कानूनी शून्य पैदा कर दिया है जिसमें कैंपस आबादी के एक बड़े हिस्से को भेदभाव का शिकार होने में असमर्थ माना जाता है।

विशेषज्ञों की चिंता है कि ये नियम जाति-मुक्त समाज की ओर बढ़ने के बजाय जाति को प्रमुख लेंस बना देते हैं। आलोचकों का तर्क है कि इरादा भले नेक हो, लेकिन डिजाइन में गंभीर खामियां हैं।

एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ने गुमनाम रहते हुए कहा, “झूठी शिकायतों पर क्लॉज हटाकर, यूजीसी ने ऐसा माहौल बनाया है जहां मात्र आरोप शैक्षणिक करियर, प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य को बर्बाद कर सकते हैं—निष्पक्षता की कोई गारंटी के बिना।”

UGC का पक्ष

यूजीसी का कहना है कि 2020 से 2025 के बीच भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। आयोग इन नियमों को समावेशी कैंपस की दिशा में एक प्रगतिशील कदम बताता है।

आगे क्या?

विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गर्म हो सकता है। कुछ आलोचकों ने इन नियमों की तुलना कांग्रेस सरकार द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा विधेयक से की है। विपक्ष में छात्र संगठन, शिक्षाविद और नागरिक समाज के सदस्य शामिल हो रहे हैं।

जनरल कैटेगरी के छात्रों की मांग है कि या तो इन नियमों को वापस लिया जाए या झूठी शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय और संतुलित समिति संरचना सुनिश्चित की जाए। सोशल मीडिया पर विरोध तेज होता जा रहा है और यह देखना बाकी है कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है।

bhorkiawazz
Author: bhorkiawazz

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